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May 31, 2012

महत्वपूर्ण है बच्चों में सुसंस्कार


महत्वपूर्ण है बच्चों में सुसंस्कार
आओ हम जीना सीखें

बालोतरा ३१ मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो
एक कार्य है बच्चों को सुसंस्कारित करना। घर में बहुएं दूसरे-दूसरे कार्यों में लगी रहती हैं। उनके पास बच्चों को संभालने का पर्याप्त समय नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में बच्चों को सुसंस्कार देने का काम यदि वृद्ध माताएं संभाल लेती हैं तो उसके तिहरे लाभ हैं। बहुओं को सहयोग मिलता है, वृद्ध माताओं को अपने समय का सदुपयोग करने का एक अच्छा आलंबन मिल जाता है और बच्चों का हित भी हो जाता है।

प...्रसंग लुई नवम का

पठित की स्मृति के अनुसार फ्रांस की राज-परम्परा में एक लोकप्रिय, प्रभावी एवं प्रतापी राजा हुए हैं, लुई नवम। उन्होंने अपने जीवन की सफलता की चर्चा करते हुए उसका श्रेय अपनी माता को दिया है। जब वे बच्चे थे, एक दिन मां ने उनको अच्छा आदमी बनने की प्रेरणा देते हुए कहा कि बेटे! तुम्हें कोई गलत काम नहीं करना है। यदि तुम गलत रास्ते पर जाते हो, अपनी आत्मा पर किसी कलंक का टीका लगाते हो तो मैं तुम्हें सिंहासन पर बैठा देखने के बजाय सिंहासन को खाली देखना पसंद करूंगी। तुम्हें गलत कार्य करते देखूं, इसकी अपेक्षा तुम्हारी लाश देखना ज्यादा पसंद करूंगी। बात कड़वी अवश्य थी पर मार्मिक थी। बच्चे के ह्रदय को छू गई। बड़ी विनम्रतापूर्वक लुई नवम बोले-मां! मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि तुम्हारा यह बेटा भले ही राजा बने या न बने, परंतु एक अच्छा नागरिक अवश्य बनेगा। मां से दिशा-बोध पाकर लुई नवम ने अपने जीवन की दिशा तब से ही सही बना ली। फलत: आगे चलकर वे एक दयालु, नीति निष्ठ, प्रभावी एवं जनप्रिय राजा बने, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है।

यह एक उदाहरण है। ऐसे और भी अनेक उदाहरण मिल सकते हैं। मूलभूत बात है बच्चों में सुसंस्कार भरने की। माताएं कभी-कभी ऐसी शिक्षा प्रदान करती हैं कि उससे बच्चे के पूरे जीवन की सही दिशा निर्धारित हो जाती है। वह सत्पथ का राही बन जाता है। मेरी दृष्टि में बच्चों में संस्कार-निर्माण का कार्य बहुत ही महत्वपूर्ण है। वृद्धजन और उनमें भी विशेषत: माताएं इस कार्य को बहुत अच्छे ढंग से संपादित कर सकती है। तात्विक दृष्टि से उनके लिए यह एक महान कर्म-निर्जरा का हेतु हो सकता है। बच्चों का लाभांवित होना तो बिल्कुल स्पष्ट ही है।

वृद्धावस्था को व्यक्ति कैसे जीए, इस दृष्टि में मैंने कुछ बिंदुओं की चर्चा की। इस क्रम में कुछ और भी बिंदु हो सकते हैं। अपेक्षा है वृद्धजन इनका सलक्ष्य अभ्यास करें, बल्कि वृद्धावस्था आने से पूर्व ही इनको जीवनगत बनाने का क्रम शुरू कर दें, जिससे वृद्धावस्था अभिशाप नहीं, वरदान बन सके।

आचार्य महाश्रमण
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May 30, 2012

बुढ़ापा वरदान कैसे बने?




बुढ़ापा वरदान कैसे बने?
बालोतरा २९ मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो
जीवन की मुख्य तीन अवस्थाएं है, बचपन, यौवन और बुढ़ापा। सामान्यत: बचपन और युवावस्था को व्यक्ति अच्छे ढंग से जी लेता है पर वृद्धावस्था कइयों के लिए अभिशाप बन जाती है। वह अभिशाप न बने, सानंद बीत सके, इसके लिए कुछ बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है। सत्तर वर्ष से अधिक अवस्था को वृद्धावस्था माना जा सकता है।

खाद्य-संयम का मूल्य

पहला बिंदु है, खाद्य-संयम। खाद्य का असंयम बहुत सारी बीमारियों का प्रमुख कारण है। यदि खान-पान का संयम नहीं है तो छोटी अवस्था में ही बीमारियां शरीर को आक्रांत कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में अनेक व्यक्ति तो वृद्धावस्था की दहलीज तक पहुंचने से पूर्व ही काल कवलित हो जाते हैं। जो काल कलवित होने से बचकर वृद्धावस्था में प्रवेश कर जाते हैं, उनके लिए यह अवस्था बीमारियों के कारण कष्टकर बन जाती है, सुखकर नहीं रहती। इसलिए यह नितांत अपेक्षित है कि व्यक्ति शुरू से ही खाद्य-संयम के प्रति जागरूक बन जाएं।

आवेश-शमन

इस क्रम में दूसरा बिंदू है, संवेग-शमन। यों तो संवेग-शमन की साधना हर अवस्था में उपयोगी एवं आवश्यक है पर वृद्धावस्था में तो इसका महत्व बहुत अधिक है। वृद्धावस्था को प्राप्त हर व्यक्ति को इसकी सलक्ष्य विशेष साधना करनी चाहिए। इसके अभाव में व्यक्ति का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है और चिड़चिड़ा स्वभाव दूसरों के लिए ही नहीं, स्वयं के लिए दुखदायी बन जाता है। वृद्ध व्यक्ति अपनी वृत्ति को शांत रखे, व्यवहार मधुर रखे, बात-बात में उत्तेजना, आक्रोश न करे, यह उसकी मानसिक प्रसत्ति और समाधि का बहुत बड़ा आधार बन सकता है। ऐसी स्थिति में घर-परिवार एवं पास-पड़ौस के लोगों के मन में उसके प्रति कोई शिकायत-शिकवा का भाव सामान्यत: पैदा नहीं होता। वह सबका प्रिय बना रहता है। इसका निष्पत्ति यह होती है कि घर-परिवार एवं पास-पड़ौस का वातावरण उसकी ओर से क्षुब्ध नहीं होता।

आचार्य श्री महाश्रमण

आओ हम जीना सीखें


May 26, 2012

सोच को प्रशस्त बनाएं


बालोतरात्न मनुष्य एक क्रियाशील प्राणी है। वह किसी न किसी क्रिया में संलग्न रहता है। सामान्यतया आदमी निष्क्रिय नहीं बैठ सकता। श्रीमद् भगवद् गीता का कथन है, नहि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्मण्यशेषत:। सामान्य शरीर धारी प्राणी संपूर्ण क्रिया को छोड़ दे यह संभव नहीं है। प्रश्न उठता है कि आदमी सबसे अधिक कौनसी क्रिया करता है? प्रयोग और परीक्षण के आधार पर यह निष्कर्ष सामने आया कि मनुष्य सबसे अधिक सोचने की क्रिया करता है। सोचना एक ऐसी क्रिया है जो हर क्रिया के साथ संपृक्त रह सकती है। व्यक्ति चलते समय सोचता है। खाते समय विचारों के उपवन में घूमता है। यहां तक की व्यक्ति नींद में भी चिंतन मुक्त नहीं रहता। एक जिज्ञासु ने किसी दार्शनिक से चार प्रश्न पूछे। उसका पहल प्रश्न था, इस जगत में सबसे बड़ा कौन है? उत्तर मिला, आकाश। दूसरी जिज्ञासा थी, संसार में सबसे आसान काम क्या है? संयत स्वर उभरा, बिना मांगे सलाह देना। तीसरी समस्या रखी गई, विश्व में सबसे कठिन काम क्या है? प्रत्युत्तर में कहा गया, अपनी पहचान। अंतिम प्रश्न था, दुनिया में सबसे अधिक गतिशील क्या है? दार्शनिक ने कहा- विचार।

वैचारिक गतिशीलता: वस्तुत: विचार सबसे अधिक गतिशील होता है। मन का कार्य है, स्मृति, चिन्तन और कल्पना। मन एक क्षण में कहीं का कहीं पहुंच जाता है। सोचने का, चिंतन का सिलसिला निरंतर चलता रहता है। सामान्य आदमी का मन किसी एक आलंबन पर स्थिर नहीं रहता। वह चंचल है, व्यग्र है, विचरणशील है इसलिए सामान्यतया वह पकड़ में नहीं आता। श्रीमद् भगवद् गीता में अर्जुन और श्रीकृष्ण के संवाद से भी यह कथ्य ध्वनित होता है। अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं-

चंचलं हि मन: कृष्ण! प्रमाथि बलवद् दृढ़म्।

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।

हे कृष्ण! यह मन चंचल है, हठी है, बलवान है। इसको मैं वश में करना चाहता हूं लेकिन मुझे लगता है कि जैसे हवा को वश में करना मुश्किल है वैसे ही इस मन को भी वश करना में मुश्किल है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के विचार के साथ सहमति प्रकट करते हुए समाधान की भाषा में कहा-

असंशयं महाबाहो! मनो दुर्निग्रहं चलम्।

अभ्यासेन तु कौन्तेय! वैराग्येण च गृह्यते।।

हे अर्जुन! नि:संदेह मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है पर निराश होने की अपेक्षा नहीं है। अभ्यास और वैराग्य, इन दो उपायों के द्वारा मन का निग्रह किया जा सकता है। बहुधा देखा जाता है कि आदमी मन की बैसाखी के सहारे ही चलता है और वह आलंबन कभी-कभी उसके लिए खतरे की घंटी भी बन जाता है। मन की चंचलता से मनुष्य व्यथित है।

आचार्य महाश्रमण


May 22, 2012

कैसे सहें?







12 hours ago 





बालोतरात्न कैसे सहन करें, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। सहना सुखी जीवन की एक अनिवार्य अपेक्षा है। वास्तव में जो सहना जानता है, वही जीना जानता है। जिसे सहना नहीं आता वह न शांति से स्वयं जी सकता है और न अपने परिवार के वातावरण को शांतिमय रहने देता है। जहां समूह है वहां कई लोगों को साथ जीना होता है। जहां दूसरे के विचारों को सुनने, समझने, सहने और आत्मसात करने की क्षमता नहीं होती, वहां अनेक उलझने खड़ी हो जाती है। जितने भी कलह उत्पन्न होते हैं, चाहे वे पारिवारिक हों या सामाजिक, उनके मूल में एक कारण असहिष्णुता है। मनुष्य में दो प्रकार की वृत्तियां होती हैं। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जेा नैसर्गिक शांत प्रकृति वाले होते हैं, प्रतनुकषाय होते हैं। उनके सामने कितनी ही प्रतिकूल स्थिति क्यों न उत्पन्न हो जाए, उनके साथ कैसा भी अप्रिय व्यवहार क्यों न कर लिया जाए, वे क्रोधित नहीं होते। ऐसे व्यक्ति परिवार और समाज के लिए आदर्श होते है। हर व्यक्ति उस आदर्श तक न भी पहुंच सके पर अभ्यास और दृढ़ संकल्प से व्यक्ति अपनी आदत को परिष्कृत और परिमार्जित कर सकता है।

शारीरिक सहिष्णुता: सबसे पहले हम शरीर को लें। कुछ व्यक्ति शरीर से बहुत कठोर श्रम कर लेते हैं तथा कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो थोड़े से श्रम से भी थकान का अनुभव करने लग जाते हैं। कुछ व्यक्ति चालीस- पचास किलो वजन आसानी से उठा लेते हैं तो कुछ व्यक्तियों को दो किलो वजन उठाने में भी सोचना पड़ता है। ऐसा क्यों? इसके पीछे कई कारण हो सकता हैं। कुछ अंशों में अभ्यास की कमी भी एक कारण बनती है। एक तथ्य यह है कि शरीर को जिस स्थिति और जिस वातावरण में रखा जाता है वह वैसा ही बन जाता है। एक बार सुविधा ही स्थिति में शरीर को रख लेने के बाद कठोरता का सहना मुश्किल हो जाता है।

क्चआचार्य महाश्रमण 

May 19, 2012

कैसे बोलें?




बालोतरा १९ मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो 
जीवन में क्रियातंत्र को संचालित करने वाले तीन तत्व हैं, मन, भाषा और शरीर। भाषा संबंधों को विस्तार देती है। समाज का निर्माण भाषा से होता है। पशुओं के पास विकसित भाषा नहीं होती शायद इसीलिए उनके समूह को समाज भी नहीं कहा जाता। भाषा के अंतर के भावों की अभिव्यक्ति होती है। हम अपने विचारों को बोलकर दूसरों तक पहुंचा सकते हैं। बोलने की क्षमता संसार के सब प्राणियों के पास नहीं होती। स्थावर जीवों के पास भाषा होती ही नहीं है। एक मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसके पास व्यक्त भाषा है। उसे बोलने की क्षमता प्राप्त है। यहां भी यह विचारणीय है कि मनुष्य में भी वाणी का विकास सबका एक जैसा नहीं होता। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो बोलते तो हैं पर बोलते समय तुतलाते हैं, हकलाते हैं। वे स्पष्टता से अपनी बात नहीं रख पाते। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनकी भाषा तो स्पष्ट होती है पर भावों को अभिव्यक्ति करना नहीं जानते। ऐसी स्थिति में वे व्यक्ति भाग्यशाली होते हैं जो अच्छी तरह बोल सकते हैं। अपनी बात को स्पष्टता से दूसरों तक पहुंचा सकते हैं। 

बोलना एक कला त्नबोलना एक बात है, कलापूर्ण बोलना दूसरी बात है। वाणी का सदुपयोग भी किया जा सकता है, दुरुपयोग भी किया जा सकता है। वाणी से मनुष्य समस्या पैदा भी कर सकता है और समाधान भी। वाणी से कल्याण का पथ भी दिखलाया जा सकता ह।ै प्रश्न है कि बोलना कैसे चाहिए? इस प्रश्न के उत्तर में चार महत्वपूर्ण सूत्रों को समझना चाहिए। वे चार सूत्र हैं, मितभाषिता, मधुरभाषिता, सत्यभाषिता, समीक्ष्यभाषिता। 

मितभाषिता त्न मितभाषिता अर्थात् अल्पभाषिता। इसका अर्थ है, कम बोलना। जितना अपेक्षित हो उससे अधिक नहीं बोलना। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो अनावश्यक बहुत बोलते हैं। इधर-उधर की बातें करने में उन्हें बड़ा रस आता है। थोड़ी सी किसी की बात उन्हें मिल जाए तो उसको फैलाए बिना उनका खाना भी हजम नहीं होता। यह वाणी का असंयम है। वाणी-संयम का एक महत्वपूर्ण उपक्रम है मौन। मौन का मूल अर्थ है, ज्ञान किंतु प्रचलित अर्थ है न बोलना। कई व्यक्ति दिनभर में घंटे, दो घंटे, पांच घंटे या उससे भी अधिक मौन लेते हैं, यह अच्छी बात है। पर कई व्यक्ति ऐसे भी हो सकते हैं जो कई घंटों का मौन करने के बाद जब बोलना शुरू करते हैं तो न बोलने की पूरी कसर निकाल लेते हैं। मौन के संदर्भ में मैं कई बार करता हूं कि कुछ समय के लिए मौन करना अच्छा है किंतु अनावश्यक न बोलने का संकल्प उससे भी अधिक अच्छा है। इस मौन के लिए घंटे- दो घंटे का समय निर्धारित करने की अपेक्षा नहीं है। यह मौन चौबीस घंटे रखा जा सकता है। इससे व्यवहार भी नहीं रूठता और सहज मौन सध जाता है। 

आचार्य महाश्रमण 

आओ हम जीना सीखें 
बालोतरा १९ मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो 


एकासन में रखें विवेक




बालोतरा १८ मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो
एकासन में भी विवेक होना आवश्यक है। ऐसा न हो कि तीन-चार बार का खाना एक बार में ठूंस-ठूंस कर खा लिया जाए। सुबह नाश्ते में भी अधिक नहीं खाना चाहिए। उपवास के पारणे में भी कई लोग अधिक खा लेते हैं। पारणे में अधिक खाना नुकसानप्रद है।

गुरुदेव तुलसी अपने जीवन का एक संस्मरण सुनाया करते थे। वे जब छोटे थे तो उपवास के पारणे में कई द्रव्य ले लेते थे। उससे पारणे के बाद बेचैनी हो जाती। पैरों में भारीपन का अनुभव होता। एक बार उन्होंने एक अनुभवी श्रावक से इसका समाधान पूछा। उसने परामर्श दिया कि पारणे में आप थोड़े से दूध के अतिरिक्त कुछ न लिया करें। उस विधि से पारणा शुरू किया तो कोई कठिनाई नहीं हुई। पारणे में संयम बहुत आवश्यक है। व्यक्ति अठाई करे, पंद्रह का तप करे या मासखमण तप करे और पारणे तथा पारणे के कुछ दिन बाद तक खाने में संयम न रखें तो तपस्या बदनाम भी हो सकती है। मनुष्य का हित भोजन करना चाहिए। हित भोजन अर्थात् हितकार भोजन। परिमित भोजन में भी वैसा खाना जो हितकार हो। जो खाना स्वास्थ्य के लिए अहितकर हो उससे बचना चाहिए।


ऋत भोजन: कैसे खाएं? प्रश्न का तीसरा उत्तर है कि ऋत भोजन। इसका शाब्दिक अर्थ है कि सत्य भोजन यानी ईमानदारी से, सच्चाई से अथवा श्रम से उपार्जित पैसे से प्राप्त होने वाला भोजन। बेईमानी से प्राप्त अन्न को अच्छा नहीं माना गया है। दूसरों को खून चूसकर जो व्यक्ति पैसा कमाता है, उसकी स्वयं की आत्मा तो भीतर से कचोटती ही है औरों की दृष्टि में भी वह अच्छा नहीं समझा जाता। कहा भी जाता है कि नीति का पैसा बरकत करता है। धर्म से आजीविका चलाने वाला श्रावक होता है। गृहस्थ साधु की तरह अपरिग्रही नहीं बन सकता। मांगकर नहीं खा सकता किंतु अर्जन के साथ साधन शुद्धि का विचार जुडऩा चाहिए। साधन शुद्धि से उपार्जित वैभव से आजीविका चलाने वाला व्यक्ति शांति और सम्मान से जीवन जीता है। इस प्रकार मित भोजन, हित भोजन और ऋत भोजन, ये तीन सूत्र भोजन के साथ जुड़ जाएं तो कैसे खाएं? इस प्रश्न का समाधान हो सकता है।

आचार्य महाश्रमण

आओ हम जीना सीखें

May 18, 2012

एकासन में रखें विवेक





बालोतरा  १८ मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो  
एकासन में भी विवेक होना आवश्यक है। ऐसा न हो कि तीन-चार बार का खाना एक बार में ठूंस-ठूंस कर खा लिया जाए। सुबह नाश्ते में भी अधिक नहीं खाना चाहिए। उपवास के पारणे में भी कई लोग अधिक खा लेते हैं। पारणे में अधिक खाना नुकसानप्रद है। 


गुरुदेव तुलसी अपने जीवन का एक संस्मरण सुनाया करते थे। वे जब छोटे थे तो उपवास के पारणे में कई द्रव्य ले लेते थे। उससे पारणे के बाद बेचैनी हो जाती। पैरों में भारीपन का अनुभव होता। एक बार उन्होंने एक अनुभवी श्रावक से इसका समाधान पूछा। उसने परामर्श दिया कि पारणे में आप थोड़े से दूध के अतिरिक्त कुछ न लिया करें। उस विधि से पारणा शुरू किया तो कोई कठिनाई नहीं हुई। पारणे में संयम बहुत आवश्यक है। व्यक्ति अठाई करे, पंद्रह का तप करे या मासखमण तप करे और पारणे तथा पारणे के कुछ दिन बाद तक खाने में संयम न रखें तो तपस्या बदनाम भी हो सकती है। मनुष्य का हित भोजन करना चाहिए। हित भोजन अर्थात् हितकार भोजन। परिमित भोजन में भी वैसा खाना जो हितकार हो। जो खाना स्वास्थ्य के लिए अहितकर हो उससे बचना चाहिए। 

ऋत भोजन: कैसे खाएं? प्रश्न का तीसरा उत्तर है कि ऋत भोजन। इसका शाब्दिक अर्थ है कि सत्य भोजन यानी ईमानदारी से, सच्चाई से अथवा श्रम से उपार्जित पैसे से प्राप्त होने वाला भोजन। बेईमानी से प्राप्त अन्न को अच्छा नहीं माना गया है। दूसरों को खून चूसकर जो व्यक्ति पैसा कमाता है, उसकी स्वयं की आत्मा तो भीतर से कचोटती ही है औरों की दृष्टि में भी वह अच्छा नहीं समझा जाता। कहा भी जाता है कि नीति का पैसा बरकत करता है। धर्म से आजीविका चलाने वाला श्रावक होता है। गृहस्थ साधु की तरह अपरिग्रही नहीं बन सकता। मांगकर नहीं खा सकता किंतु अर्जन के साथ साधन शुद्धि का विचार जुडऩा चाहिए। साधन शुद्धि से उपार्जित वैभव से आजीविका चलाने वाला व्यक्ति शांति और सम्मान से जीवन जीता है। इस प्रकार मित भोजन, हित भोजन और ऋत भोजन, ये तीन सूत्र भोजन के साथ जुड़ जाएं तो कैसे खाएं? इस प्रश्न का समाधान हो सकता है। 

आचार्य महाश्रमण 

आओ हम जीना सीखें 

May 17, 2012

कैसे खाएं?




बालोतरा १७ मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो के लिए

बालोतरा त्नभोजन जीवन की एक अनिवार्यतम अपेक्षा है। शरीर को तंदुरूस्त रखने के लिए हर आदमी को भोजन करना होता है। भोजन करना एक बात है। विवेकपूर्ण भोजन करना दूसरी बात है। प्रश्न होता है-कैसे खाएं ? इस प्रश्न के उत्तर में तीन महत्वपूर्ण सूत्र दिए जा सकते हैं, मित भोजन, हित भोजन और ऋत भोजन।

मित भोजन: मित भोजन अर्थात् अधिक न खाना, भूख से दो ग्रास कम खाना। दो चपाती की भूख हो तो डेढ़ चपाती खाना लाभदायक हो सकता है पर दो की जगह ढाई-तीन चपाती खाना बीमारी को निमंत्रण देना है। एक बार उचित मात्रा में भोजन कर लिया जाए, उसके बाद कोई स्वादिष्ट वस्तु भी सामने आए तो मन पर कंट्रोल होना चाहिए। यथासंभव खाने का प्रयास न हो। एक बार अच्छी मात्रा में भोजन होने के बाद तीन-चार घंटे पेट को विश्राम मिलना चाहिए। कई लोग त्याग करने का अच्छा क्रम रखते है। दिन में दो घंटे, तीन घंटे, पांच घंटे जितना सम्भव हो, खाने का त्याग कर देते हैं। यह एक अच्छी बात है। इससे सहज तप:साधना सध जाती है, खाने का संयम हो जाता है और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी हितकर है।

मैं जब छोटा बच्चा था, साधुओं के पास जाया करता था। वहां एक वृद्ध श्रावक से मिलना हुआ। उनके पास एक छोटी सी पुस्तिका थी। उस पर लिखा था- खाते-पीते मोक्ष। मैंने जानकारी की कि खाते-पीते मोक्ष कैसे हो सकता है। खाने का एक घंटे का त्याग कर दो, एक बिंदु लगा दो। फिर त्याग करो, दूसरा बिंदु लगा दो। इस प्रकार इस पुस्तिका के सब कोष्ठक भरे जाते हैं। इसका एक ही उद्देश्य है कि त्याग की दिशा में व्यक्ति की अधिक से अधिक गति हो। यह तब संभव हो सकता है जब व्यक्ति का जिह्वा पर संयम हो। सामान्यत: खाना पूरा हो जाए, उसके बाद चाहे मनोज्ञ पदार्थ भी सामने क्यों न आ जाए, खाने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। खाने में जल्दबाजी करना भी अनुचित है। जो धीरे-धीरे चबा-चबा कर खाता है, उसके लिए खाद्य-संयम काफी आसान हो जाता है। खाते समय व्यक्ति का दिमाग भी शांत होना चाहिए। कहा गया है-ईष्र्या, भय, क्रोध, लोभ आदि स्थितियों में किए गए आहार का परिपाक सम्यक नहीं होता है। जठराग्नि मंद हो जाती है। जैन तपो विधि में आहार-संयम के कई प्रयोग विहित है, अनशन यानी उपवास आदि। ऊनोदरी यानी नवकारसी, प्रहर आदि। एक अवस्था आ जाने के बाद व्यक्ति सांयकाल का भोजन कम कर दे या बिल्कुल छोड़ दे तो शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से उचित हो सकता है।

आचार्य महाश्रमण
बालोतरा १७ मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो के लिए

May 16, 2012


जीवन को निश्चित दिशा की जरूरत
बालोतरा १५ मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो

मुनि से तात्पर्य केवल मुनि वेष धारण करने से नहीं है, अपितु मूर्छा के टूटने से है। संन्यास के बाद भी यदि मूर्छा नहीं टूटी, भीतर की चेतना त्याग और संयम की ओर नहीं मुड़ी तो उसे जागते हुए भी जागृत नहीं कहा जा सकता।

एक संत थे। छोटी अवस्था में ही दीक्षित हो गए। बाहर से संसार छोड़ दिया, पर भीतर में संसार बसा हुआ था। वासना का धागा टूटा नहीं था। आत्म-लौ प्रज्ज्वलित नहीं हुई थी, इसलिए चिंतन के दरवाजे पर दस्तक हुई। आत्मा-परमात्मा की बातें कपोल-कल्पित हैं। यदि परमात्मा होता तो मुझे अब तक उसका दर्शन होना चाहिए था किंतु ऐसा अब तक कुछ भी नहीं हुआ। लगता है मैं ठगा गया। व्यर्थ ही संसार के भोगों से वंचित रहा। खैर, अभी भी समय है। युवा अवस्था ही तो है, पुन: घर चला जाऊं और संसार के सुख भोगूं। ऐसा विचार कर वह घर की ओर चला। शहर में पहुंचा, एक दुकान दिखाई दी। उस दुकान में जो दुकानदार बैठा था, वह उसके बचपन का साथी था। मित्र से मिलने की इच्छा जागृत हुई, दुकान के भीतर गया। वर्षों के बाद मुनि वेष में अपने साथी को देख दुकानदार भी प्रसन्न हुआ। उसने मुनि का स्वागत किया, उसे बिठाया। मुनि ने पूछा दुकान में इतने पीपे पड़े हैं, इनमें क्या रखा है? दुकानदार ने एक-एक पीपे का परिचय देते हुए बताया कि महाराज अमुक-अमुक में घी, तेल, गुड़, नमक, मिर्च, धनिया, सोंठ आदि हैं। कोने में दो पीपे और पड़े थे। मुनि ने पूछा, इन पीपों में क्या है? दुकानदार ने अपनी भाषा में जवाब दिया महाराज उन पीपों में राम-राम है। मुनि ने पूछा अरे, राम-राम भी किसी वस्तु का नाम है क्या? दुकानदार बोला महात्मा जी, आप हमारी दुनियादारी की भाषा को क्या समझें। कोई बर्तन या पीपा खाली होता है तब हम खाली है, ऐसा नहीं कहकर 'राम-राम है' ऐसा कहते हैं। ये दोनों पीपे तो खाली हैं, इनमें कुछ भी नहीं है। दुकानदार की सीधी सी कही हुई बात मुनि के दिल को छू गई। वह सोचने लगा कि इसने मुझे बड़े रहस्य की बात कही। जो खाली होता है उसी में राम-राम रहता है, भरे हुए में तो दुनियादारी है। राम-राम तो खाली रहने वालों को ही मिलता है। मुझे भी तो राम-राम को पाना है। इसके लिए पहले मन-मस्तिष्क को खाली करना होगा। जब तक दिमाग क्रोध, ईष्र्या, घृणा, अहंकार से भरा रहेगा, जब तक मन में राग द्वेष हिलोरें लेती रहेंगी, वासना में संस्कार बद्धमूल रहेंगे तब तक राम नहीं मिलेगा। बस, यह आत्मबोध जागा और वहां से चरण पुन: मुड़ गए। जिंदगी में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो जिंदगी को एक निश्चित दिशा देते हैं, पूरे जीवन को उजाले से भरते हैं। कभी-कभी लोग कह देते हैं कि रोजाना प्रवचन श्रवण क्यों करे? क्या होगा सुनने से? पर ऐसे प्रेरक प्रसंग इस बात के साक्षी है कि जीवन में रूपांतरण लाने के लिए, अपूर्व को ग्रहण करने, जिज्ञासा को समाहित करने, समस्याओं का समाधान पाने, सद्भाव की प्रेरणा उपलब्ध करने के लिए संत समागम बहुत उपयोगी है। उससे भावनिद्रा टूट सकती है और श्रेयस की ओर कदम आगे बढ़ सकते हैं।

आचार्य महाश्रमण

May 13, 2012

कैसे सोएं?



(12/05/12 ) जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो
बालोतरा. शरीर तंत्र को स्वस्थ व सक्रिय रखने के लिए निद्रा जरूरी है। नींद एक प्रकार का विश्राम है। व्यक्ति प्रवृत्ति करता है। प्रवृत्ति से थकान आती है। थकान के बाद व्यक्ति विश्राम की अभिलाषा करता है। विश्राम के लिए वह निद्रा देवी की गोद स्वीकार करता है। कौन व्यक्ति कितनी नींद ले इस संबंध में कोई निश्चित अवधारणा नहीं है। यद्यपि अवस्था के साथ नींद का विचार किया गया है पर उसमें भी कोई नियामकता नहीं है। कुछ व्यक्ति बहुत कम नींद लेकर भी ताजगी का अनुभव करते हैं तो कुछ लोग पर्याप्त नींद लेकर भी अलसाए रहते हैं। योगी और कर्मशील व्यक्ति नींद को बहुमान नहीं देते। भगवान महावीर का साढ़े बारह वर्षों का साधना काल रहा। इसमें उन्होंने बहुत कम नींद ली। सामान्यत: नींद का संबंध अपनी-अपनी शारीरिक-प्रकृति के साथ है। सामान्यत: बच्चे अधिक नींद लेते हैं, उनकी नींद गहरी होने के साथ मीठी होती है। हम बाल मुनियों को जब सुबह उठाते हैं, तो उनमें से कुछ बड़ी मुश्किल से उठते हैं। जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, नींद प्राय: कुछ कम हो जाती है।

सोने की कला-
(12/05/12 ) जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो
सोना भी एक कला है। उसकी कसौटी है अच्छी और गहरी नींद लेना। व्यक्ति स्वस्थ हो, दिमाग पर किसी प्रकार का भार न हो, चित्त प्रसन्न हो तो नींद अच्छी आती है। आचार्य को मैंने देखा कि जीवन के नौवें दशक में भी उन्हें गहरी और अच्छी नींद आती थी। कई बार तो वे सोते ही तत्काल नींद में चले जाते थे। यह बहुत अच्छी स्थिति है। तनाव मुक्त जीवन जीने वाला व्यक्ति ऐसी नींद ले सकता है। ऐसी नींद वास्तव में कलात्मक नींद है। सोते सब हैं पर सोने की कला विरले व्यक्ति ही जानते हैं। इस कारण कुछ व्यक्ति अति निद्रा के शिकार हो जाते हैं, तो कुछ अनिद्रा के। अति चाहे नींद की हो या जागरण की, दोनों ही ठीक नहीं है। जान बूझकर नींद न लेना और नींद दूर करने के लिए प्रयत्न करना एक दृष्टि से अच्छा नहीं होता। उससे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। खाते-पीते, उठते-बैठते, सोते-जागते व्यक्ति के दिमाग में विचारों की भीड़ उमड़ती रहती है। सोते समय भी वह अकेला नहीं होता। फलत: वह चैन से नींद नहीं ले पाता।

आचार्य महाश्रमण
(12/05/12 ) जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो
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May 12, 2012

अच्छी संगति में बैठें


JTN 12 मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो के लिए

आओ हम जीना सीखें

आओ हम जीना सीखें



बालोतरा. किसके पास बैठना है, इसका भी अपना महत्व है। 'संगत रंगत लाती है' यह एक सार्थक कहावत है। व्यक्ति को जैसी संगति मिलती है, उसके जीवन की दिशा उसी ओर मुड़ जाती है। इसलिए इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि हमारी संगति कैसी हो?

ज्ञानी व्यक्ति की संगति ज्ञान की चेतना जगाती है और मूर्ख की संगति बुराइयों की ओर धकेलती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए मनुष्य को चाहिए कि वह सच्चे और अच्छे आदमी के पास अपनी ऊठ-बैठ रखे। संतों की सन्निधि में बैठने का अपना मूल्य है। भले उनकी बात समझ में आए या न आए, पर उनकी सन्निधि में जो समय बीतता है वह शुभ होता है। उस अवधि में व्यक्ति सहज ही कई बुराइयों से बच जाता है। संतो की सन्निधि में बैठा हुआ व्यक्ति सामान्यत: न झूठ बोलता है, न चोरी करता है, न नशा करता है और न गुस्सा करता है। यह बहुत बड़ा लाभ है। जीवनोपयोगी ज्ञान भी मिल सकता है इसलिए जहां भी मौका मिले, सत्संग का लाभ उठाना चाहिए।

सभा में कैसे बैठें?

किसी प्रवचन सभा में आदमी कैसे बैठे? इसका भी अपना महत्व है। जब व्यक्ति श्रोता बनकर बैठता है तो श्रोता का वक्ता के साथ तादात्म्य भाव जुडऩा आवश्यक है। श्रोता वक्ता को देवता के समान मानें। जैसे देव की पूजा एकाग्रता के साथ की जाती है, वैसे ही श्रोता वक्ता को देवता की भांति ध्यान से सुने। उसके साथ गहरा तादात्म्य भाव स्थापित करे। ऐसा करके ही वह प्रवचन का रसास्वादन कर सकता है। वक्ता भाषण दे और श्रोता नींद लेनी शुरू कर दे या बातें करनी शुरू कर दे तो वक्ता का उत्साह मंद हो जाता है। ध्यान से सुनने वाले श्रोता मिलें तो वक्ता का उत्साह दुगुना हो जाता है और वह ज्यादा उत्साह के साथ अपनी बात प्रस्तुत कर सकता है।

आचार्य महाश्रमण


May 11, 2012

बैठना भी एक कला है



आओ हम जीना सीखें


बालोतरा ११ मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो के लिए

जीवन की कला के साथ अनेक विषय जुड़े हुए हैं। उनमें एक विषय है कि कैसे बैठें? बैठना एक कला है कब, किसके सामने, कैसे बैठना चाहिए इसका अपना विज्ञान है। बड़ों के सामने कैसे बैठें? छोटों के सामने कैसे बैठें? प्रवचन के समय किस स्थिति में बैठें? जो व्यक्ति इन बातों की जानकारी रखता है, उसका बैठना कलापूर्ण हो सकता है। एक आदमी बैठता है। उसमें चंचलता झलकती है। वह कभी इधर देखता है, कभी उधर देखता है, कभी आगे झुकता है, कभी पीछे झुकता है, कभी शरीर को मोड़ता है, कभी अनावश्यक हाथ पैर का संचालन करता है। यह चंचलता है। अनावश्यक चंचलता अवांछनीय होती है। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो हाथ पर हाथ दिए बैठे रहते हैं। या निरर्थक बातें करते रहते हैं। कोई उद्देश्य नहीं, कोई लक्ष्य नहीं। यह भी उचित नहीं है। मनुष्य को किसी न किसी सत्कार्य में लगे रहना चाहिए। कौन किस कार्य में लगे यह अपनी-अपनी योग्यता और रुचि पर निर्भर करता है। जो साहित्य पठन में रुचि रखे, वह साहित्य का अध्ययन करे। जो लेखन में रुचि रखे, वह लेखन कार्य करे। इस प्रकार के कार्य जिनके संभव नहीं हैं। वे किसी मंत्र का जप करना शुरू कर दें। हाथ की अंगुलियों पर जप किया जा सकता है। उसमें समय का सदुपयोग के साथ आत्मशुद्धि होगा। जप साधना का सुगम उपाय है। आप जहां कहीं भी बैठे हैं, समय मिला कि आंख मूंद कर जप करना शुरू कर दिया। इनमें न भूखे रहना आवश्यक है न और कोई कठिन तपश्चरण। यह समय को सार्थक बनाने का उपाय है। आप ट्रेन में यात्रा कर रहे हैं, खाली बैठे हैं, वहां भी अध्ययन, जप आदि के द्वारा समय को सार्थक बनाया जा सकता है।

ध्यान में कैसे बैठें?


बालोतरा ११ मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो के लिए

सीधा बैठना, तनावमुक्त होकर बैठना ध्यान की पहली शर्त है। ध्यान के लिए कई विशेष आसन भी निर्दिष्ट हैं-पद्मासन, वज्रासन, सुखासन आदि। यों तो ध्यान के लिए किसी विशेष आसन की अनिवार्यता नहीं है। जिस आसन में आदमी लंबे काल तक बैठे सके, आराम से बैठ सके और प्रयोग कर सके, वही आसन ध्यान के लिए उपयोगी है। वज्रासन को ध्यान की दृष्टि से तो उपयोगी माना ही गया है, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इसे उपयोगी माना गया है। भोजन के बाद इस आसन में कुछ देर तक बैठना पाचन-तंत्र के लिए लाभदायक है। बैठने की मुद्रा भी ठीक होनी चाहिए। चिंता की मुद्रा न हो, आवेश की मुद्रा न हो, प्रसन्नता की मुद्रा हो। मुद्रा के साथ भावों का गहरा संबंध है। भीतर में आक्रोश है तो चेहरे की मुद्रा भिन्न प्रकार की होगी। भीतर की प्रसन्नता है तो चेहरे की मुद्रा भिन्न प्रकार की होगी। यों भी कहा जा सकता है कि मुद्रा ठीक है तो हमारे भाव भी अच्छे हो सकते हैं और मुद्रा ठीक नहीं है तो भाव भी विकृत हो सकते हैं।

आचार्य महाश्रमण


May 9, 2012

आंखों का सम्यक् उपयोग जरूरी



बालोतरा 07 May-२०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो


आंख होना एक बात है और उसका उपयोग करना दूसरी बात है। जिनके पास आंखें नहीं हैं उनके लिए उपयोग-दुरुपयोग का प्रश्न ही नहीं उठता। लेकिन जो देखने में समर्थ हैं, उनके लिए विचारणीय है कि वे आंखों का सम्यक् उपयोग करते हैं या दुरुपयोग करते हैं। कोई संतों के दर्शन करता है, अच्छा साहित्य पढ़ता है, अच्छे दृश्यों का अवलोकन करता है, अनिमेष प्रेक्षा करता है यह आंखों का सदुपयोग है। आंखों का दुरुपयोग भी हो सकता है। एक व्यक्ति आंखों से किसी को बुरी दृष्टि से देखता है, खराब दृश्य देखता है, अश्लील साहित्य पढ़ता है, जीवन को पतन की ओर ले जाने वाले दृश्यों को देखता है, यह आंखों का दुरुपयोग है। आंखें बहुत मूल्यवान हैं। विचारणीय बात यह है कि जिनको आंखे प्राप्त हैं वे उनका यथार्थ मूल्यांकन करते हैं या नहीं ? आंखों का मूल्य उनसे पूछा जाए, जिनके पास आंखें नहीं हैं। नेत्रहीन व्यक्ति की दुनिया बहुत छोटी होती है।

दृष्टि में बदलाव लाएं

किसी भी क्रिया के पीछे दृष्टिकोण होता है। बिल्ली अपने बच्चे को भी पकड़ती है और चूहे को भी पकड़ती है, पर दोनों की पकड़ में बहुत बड़ा अंतर होता है। बच्चे के प्रति ममता का भाव है, चूहे के प्रति क्रूरता का। बच्चे को बचा लेती है, चूहे को मार देती है। अंतर्दृष्टि का अंतर है। दृष्टि में अंतर आते ही परिणाम में अंतर आ जाता है। एक शल्य चिकित्सक भी पेट को औजार से चीरता है और एक डाकू भी पेट को छुरा घोंपकर चीरता है। पेट को चीरने की क्रिया एक होने पर भी दृष्टि की समानता नहीं है। डॉक्टर की दृष्टि व्यक्ति को जीवनदान देने पर टिकी है, डाकू की दृष्टि जीवन को लूटने पर टिकी है। दृष्टि में बदलाव आते ही सब कुछ बदल जाता है।
 

अहंकार पतन का मार्ग


अहंकार पतन का मार्ग


बालोतरा जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो
मानव जीवन दुर्लभ माना जाता है। इसका सही मूल्यांकन होना जरूरी है। पदार्थ परक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति जीवन की महत्ता समझ नहीं सकता। अहंकार पतन का मार्ग है। अहंकारी व्यक्ति यथार्थ से अनभिज्ञ रहता है। औरों के सामने व्यक्ति अहंकार का प्रदर्शन कर भी सकता है पर मौत के आगे तो किसी का अहं नहीं चलता। कोई यह सोचे कि मेरे पास सुरक्षा की बहुत बड़ी व्यवस्था है, मौत मेरा क्या बिगाड़ेगी ? क्या वह मौत के मुंह में जाने से बच सकता है ?

ज्ञानीजन कहते हैं , व्यक्ति किस बात का अहं करे? आज जिसे मनुष्य जन्म प्राप्त है, वह कितनी बार बेर की गुठली में पैदा हुआ होगा? कितनी बार खजूर की गुठली में जन्म लिया होगा? कितनी बार सांप, बिच्छू बना होगा? कितनी बार पेड़-पौधा बना होगा? जो व्यक्ति सच्चाई को समझ लेता है, उसका अहं खत्म हो जाता है।

मानव की महत्ता

व्यक्ति अपनी दृष्टि को सम्यक बनाए, चिंतन करे, जीवन की महत्ता समझे, यह अपेक्षित है। इंसान में भगवान बनने की सामथ्र्य है। आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति है। पशु-पक्षी जगत में वह नहीं है। देव भी भगवत्ता को प्राप्त नहीं हो सकते। एक मात्र मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो विकास के परम शिखर को छू सकता है। इस दृष्टि से मनुष्य जीवन का बहुत बड़ा महत्व है। मनुष्य में सोचने की सामथ्र्य है, विवेक-चेतना है। वह धर्म का आचरण कर सकता है। मनुष्य और पशु के बीच भेद रेखा खींचने वाला धर्म ही है। आहार, निद्रा, भय, मैथुन- इन चार बातों की मनुष्य और पशु में समानता है। एक धर्म अथवा विवेक ही ऐसा तत्त्व है, जिसके आधार पर पशु से मनुष्य की अलग पहचान होती है।

दृष्टि में ही सृष्टि

दृष्टि में ही सृष्टि है। चिंतनीय बिंदु है कि दृष्टि कहां टिकी है? सद्गुणों पर या दुर्गुणों पर? हम विचार करें कि आदमी की दृष्टि कहां टिकी है, गुणों पर या बुराइयों पर? सद्गुण ग्राह्य हैं और दुर्गुण त्याज्य। क्रोध करना, अपशब्द का प्रयोग करना, असत्य बोलना, धोखा देना, चोरी करना, असंयम करना, ये दुर्गुण हैं। विनम्र रहना, किसी को कष्ट न देना, असत्य न बोलना, सरल होना, ये सद्गुण हैं। सद्गुण संजोकर व्यक्ति महान तो दुर्गुण संजोकर व्यक्ति अधम बन सकता है। अपेक्षा है महान बनने के बीजों पर दृष्टि रखते हुए उन्हें पल्लवित, पुष्पित और फलित करने की दिशा में गति हो और पतन की ओर ले जाने वाले बीजों को नष्ट करने का प्रयत्न हो। जीवन की सफलता का यह बीजमंत्र है।

आचार्य महाश्रमण

आओ हम जीना सीखें
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छोटी लगने वाली बातों पर भी दें ध्यान


छोटी लगने वाली बातों पर भी दें ध्यान
आओ हम जीना सीखें 


बालोतरा ८ मई २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो
हाथी को एक छोटा सा अंकुश वश में कर सकता है, एक नन्हा सा दीपक सघन अंधकार का हरण कर सकता है, बड़े-बड़े पहाड़ों को छोटा सा वज्र धराशायी कर सकता है। इसलिए 'यह छोटा है' यह समझकर किसी की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए। छोटी लगने वाली बातों पर भी ध्यान देना जरूरी है। कैसे उठें, बैठें, चलें, बोलें आदि बातें बहुत छोटी लगती हैं पर जीवन-महल को खड़ा करने वाली नींव की ईंटें यही हैं।

चलने में विवेक


हम चलने की क्रिया पर विचार करें। चलना अर्थात गति करना। गति दो प्रकार की होती है। एक है पैरों से चलना दूसरा जीवन को विकास की दिशा में आगे बढ़ाना। किंतु इस गति में भी विवेक का होना जरूरी है। विवेक अर्थात कब चलना, कैसे चलना, क्यों चलना आदि बातों की जानकारी आवश्यक है। बिना प्रयोजन न चलें। बिना प्रयोजन वही चलता है जो समय का मूल्य नहीं आंकता। दूसरा प्रश्न है, प्रयोजन से चलें तो कैसे? आदमी उद्देश्य विशेष के साथ चलने के लिए प्रवृत्त हो तो सबसे पहले ईष्टमंत्र का स्मरण करे ताकि प्रवृत्ति के साथ मंगल जुड़े और चित्तवृत्ति मंगल से भावित हो जाए। पूज्य गुरुदेव आचार्य महाप्रज्ञ हरियाणा में विहार कर रहे थे। रास्ते में एक संत दुर्घटनाग्रस्त हो गए। उन्हें चोटें आई। आचार्य महाप्रज्ञ ने उस समय एक मंत्र दिया और कहा कि यात्रा से पूर्व इस मंत्र का स्मरण कर लेना चाहिए ताकि विघ्न-बाधाओं से बचा जा सके। चलने का विवेक अहिंसा की साधना की भी पुष्टि कर सकता है। दशवैकालिक सूत्र में चलने का विवेक देते हुए कहा गया है कि साधु जल्दी-जल्दी न चले, स्वाध्याय करता हुआ न चले, व्यग्र चित्त से न चले आदि। एक राजस्थानी दोहा है-

नीचै देख्यां चार गुण, गमी वस्तु मिल जाय।
दया पळै, हिंसा टळै, दृष्टि दोष टळ जाय।।

नीचे देखकर सावधानी पूर्वक चलने के चार लाभ हैं। खोई हुई वस्तु मिल सकती है, दया भावना पुष्ट हो सकती है, हिंसा से बचाव हो सकता है और दृष्टिदोष टल सकता है।प्रेक्षाध्यान का संदर्भ में गमनयोग शब्द प्रयुक्त होता है। गमनयोग से तात्पर्य है कि मात्र गति पर ही ध्यान केंद्रित रखना। चलते समय बात करना, चिंतन करना आदि क्रियाएं सामान्यत: नहीं होनी चाहिए। सड़क पर चलने के कुछ नैतिक नियम भी हैं। सड़क के बीच में नहीं चलना चाहिए। कभी-कभी थोड़ी सी सुविधा के लिए आदमी जानता हुआ भी विपरीत साइड में चलने लगता है। किंतु नियम का अतिक्रमण कभी-कभी खतरे की घंटी बन सकता।
आचार्य महाश्रमण