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Jun 7, 2012

डॉ,राजेन्द्रप्रसाद आचार्य तुलसी सवाद


भारतीय विधान परिषद अध्यक्ष  देशरत्न डा राजेन्द्रप्रसाद आचार्य तुलसी के दर्शनार्थ दिल्ली से वायुयान द्वारा जयपुर  आऎ. डा राजेन्द्रप्रसाद ने विनम्रता पुर्वक आचार्य तुलसी  को प्रणाम किया.
शान्त मुद्रा मे बैठ गये. लगभग दो घण्टा विचार विनिमय हुआ.

डा राजेन्द्रप्रसाद -" जैन ग्रन्थो की मोलिक भाषा कोनसी है ?
आचार्य तुलसी  -" जैन आगम अर्धमागधी भाषा मे है."
डा राजेन्द्रप्रसाद -" इस वक्त देश मे नैतिक आन्दोलन की बदी आवश्यकता है. यघपि हम विदेशी पराधीनता से मुक्त हो गये है. फ़िर भी अपने देश की गरिमा को सुरक्षित रखने के लिए यदि हमने नैतिक स्तर को नही सम्भाला तो देश का पतन हो जाऎगा.
आचार्य तुलसी  -" नैतिक वातावरण बनाने के लिऎ बडे नेताऒ का सहयोग भी अपेक्षित है. 
डॉ,राजेन्द्रप्रसाद -" धर्म के बारे मे आप क्या कहते है ?"
आचार्य तुलसी  -" किसी को मारना या बचाना ही धर्म-अधर्म नही है. धर्म का सम्बन्ध आत्मा के उत्थान  से  है.जिस प्रवत्ति से आत्मा का पतन हो  वह कभी धर्म नही हो सकता.( आचार्य श्री ने डा राजेन्द्रप्रसादजी को वह चित्र दिखाया जिसमे चोर, कसाई, और व्यभिचारी पुरूषो को समझाकर उनकी चोरी हत्या व व्यभिचारी की प्रवति छुडाई गई).
डा राजेन्द्रप्रसाद -"आज आपके दर्शनो से मुझे बडी प्रसन्न्ता हुई. मै अणुव्रती सघ के विषय मे गहरा अनुशीलन करुगा. अणुव्रत आपके द्वारा दिया गया एक ऎसा आन्दोलन है जिसकी भारत को ही नही, विश्व को अपेक्षा  है. मै चाहता हू इसका बाहर भी प्रचार हो .
धर्म, दर्शन, और साहित्य, के सन्दर्भ मे विविघ आयामी चर्चा के बाद मुनिश्री नथमलजी( जो अब तेरापन्थ के दशम आचार्य महाप्रज्ञ के नाम से जाने जाते है) ने राजनिति मे हिन्सा विषय पर सस्कृत मे आसु कविता की. उसे सुनकर राष्ट्र्पतिजी अत्याधिक प्रसन्न हुऎ.प्रस्थान करने से पुर्व राजेन्द्र बाबू ने भूमि पर मस्तक टिकाकर आचार्यश्री को भक्तीपुर्ण प्रणाम किया.
जयपुर
चन्दनमहल
नवम्बर १९४९
आचार्य तुलसी सवाद शिखरपुरुषो के साथ-१
सम्पादिका- साध्वी प्रमुखा कनक प्रभा
पेज क्रमाक १ से ६
Acharya Shri Tulsi

     Name:Acharya Shri Tulsi
     Date of Birth:20th October 1914
     Place of Birth:Laudanum (Rajasthan)
     Name of Parents:Jhoomarmal, Vandana
     Initiation- Date:5th December 1925
     Place:Ladnun (Rajasthan)
     Guru:Shri Kalugani
     Designated Acharya
     Date:26th August 1936
     Place:Gangapur (Rajasthan)
     Name:Acharya Shri Tulsi
     Designated Yugpradhan
     (Pradhan of the Era)
     Date:2nd February 1971
     Place:Bidasar (Rajasthan)
     Name:Yugpradhan Acharya Shri Tulsi
     Journey by Foot:62,000 miles
     Writings:more than 100 books

राष्ट्रपति डॉ, राजेन्द्र प्रसाद-" आचार्यजी! पण्डित नेहरु से आप मिले या नही ?" आचार्य-" उनके बारे मे हमने सुना है कि धर्म और धर्मगुरुओ मे उनकी कोई अभिरुची नही।"



 राष्ट्रपति डॉ, राजेन्द्र प्रसाद जितने बडे विद्धवान थे उतने ही दृष्टी सम्पन थे। अध्यात्म और धर्म के प्रति उनके मन मे प्रगाढ आस्था थी। देश कि जनता का नैतिक स्तर उन्नत हो, यह उनका लक्ष्य था। आचार्यश्री तुलसी के साथ उनके सम्पर्क और अणुव्रत के असाम्प्रदयिक स्वरुप की जानकारी के बाद यह बात उनके समझ मे आ गई थी कि अणुव्रत का अभियान नितान्त नैतिक अभियान है।  यह देश के हित मे है, और मानवता के हित मे। उनकी इच्छा थी कि इस अभियान को व्यवस्थित रुप से देश मे चलाया जाऐ।
इसके लिए पण्डित जवाहरलाल नेहरु के साथ आचार्य श्री का मिलन, आवश्यक समझते थे।
बातचीत के मध्य उन्होने कहा-"आचार्यजी! पण्डित नेहरु से आप मिले या नही ?"
आचार्य श्री ने कहा-"नही, पण्डितजी से हमारा कोई परिचय नही है। उनके बारे मे हमने सुना है कि धर्म और धर्म गुरुओ मे उनकी कोई अभिरुची नही है। वे न धर्म की चर्चा करते है और ना ही धर्म गुरुओ से मिलते है।  न हमने उनसे मिलने का प्रयास किया और न उनकी और से हमे कोई सवाद मिला। आप हमारे काम मे रस लेते है इसलिए आपसे मिलने मे प्रसन्नता होती है।
राष्ट्रपति-"आचार्यजी! पण्डितजी के बारे मे आपकी ऐसी धारणाए हो सकती है। पर वे बहुत अच्छे विचारो के व्यक्ति है। उनसे आपका मिलना आवश्यक है। आप अणुव्रत का जो काम कर रहे है, वह उनके ध्यान मे आ जाऍ तो आपको काम करने मे सुविधा रहेगी। मै चाहता हू आप एक बार उनसे अवश्य मिले।
आचार्य श्री -"आप आवश्यक समझते है तो हमे पण्डितजी से मिलने मे कोई आपत्ति नही है। इसमे माध्यम आपको ही बनना होगा। क्योकि उनके साथ हमारा कोई परिचय नही है।"
राष्ट्रपति-" ठीक है, मै आपके और उनके बीच मे सम्पर्क स्थापित कर दूगा।"
(राष्ट्रपति महोदय ने आचार्य श्री तुलसी क हवाला देते हुऍ प्रधानमन्त्री को पत्र लिखा-"प्रिय प्रधानमन्त्रीजी! आचार्य श्री तुलसीजी से आपका मिलना देश के हित मे होगा । अभी वे दिल्ली मे आए हुऍ है। सम्भव हो तो इस पर विचार करे।")
प्रधानमन्त्री जहवारलाला नेहरु को राष्ट्रपति का पत्र मिला। उन्होने उसके उत्तर मे लिखा -" प्रिय राष्ट्रपतिजी! मुझे आचार्य श्री तुलसीजी से मिलकर प्रसन्नता होगी। मै इन दिनो व्यस्त हू। इसलिए आचार्यश्रीजी यदि प्रधानमत्री-निवास पर दर्शन दे तो बडी कृपा होगी।"
राष्ट्रपति के निजी सचिव चक्रधरशरण बाबू नया बाजार स्थित अणुव्रत भवन आऍ। उन्होने राष्ट्रपति और प्रधानमत्री के बीच हुए पत्र-व्यवाहर की जानकारी देते हुए कहा-" राष्ट्रपति महोदय कि इच्छा है कि आप प्रधानमत्री निवास पधारे। प्रधानमत्री ने आपके साथ भेट के लिए कार्तिक शुक्ला पुर्णिमा के दिन सायकालीन सात बजे का समय निश्चित किया है।" चक्रधरशरण बाबू की बात सुनकर आचार्य श्रे बोले-" हम लोग पद यात्री है। पदयात्रा करते हुऐ हम गॉव-गॉव, नगर-नगर, घर घर जाते रहते है। इसी क्रम मे हम प्रधानमत्री निवास भी जा सकते है। किन्तु प्रधानमत्री ने जो समय दिया है वह हमारे अनुकुल नही है। कार्तिक  पुर्णिमा को हमारा चातुर्मास सम्पन्न हो रहा है, इसलिए हम आवास स्थल छोड कर नई दिल्ली नही जा सकते है। दुसरी बात रात्रिकालिन हम बहार नही जाते। इसलिए सात बजे पहुचना भी सम्भव नही है। रात भर प्रधानमत्री की कोठी मे रहना भी कठीन है।  इसलिए मिलने का कोई दूसरा समय निर्धारित करना होगा ।
चक्रधरशरण बाबू  ने पुरी बात चीत की जानकारी राष्ट्रपति महोदय को दे दी। राष्ट्रपति ने पुनः प्रधानमत्री से सम्पर्क किया। उनसे दुसरा समय मागा गया। तो वे बोले -"आचार्यश्रीजी को जिस दिन,जिस समय यहॉ आने की सुविधा हो वही समय रखा जा सकता है।  मिगसर कृष्णा प्रतिपदा के दिन मध्यान के दिन ढाई बजे का समय निश्चित हुआ।
मिगसर कृष्णा प्रतिपदा  को नया बाजार से चातुर्मास प्रवास सम्पन्न होने पर आचार्य श्री तुलसी विहार कर चक्रधरशरण बाबू  की कोठी पर पधारे। वह कोठी प्रधानमन्त्री निवास से एक फ्लॉग की दूरी पर थी। वहॉ से आचर्यश्री ढाई बजे चलकर प्रधानमन्त्री नेहरु के निवास पहुचे।  उस समय आचार्य श्री तुलसी के साथ सात साधू  थे। इसमे वर्तमान तेरापन्थ के आचार्य महाप्रज्ञ जी मुनी नथमलजी के रुप मे साथ थे। साथ ही कई श्रावकगण भी थे।
 प्रधानमन्त्री की कोठी  के बाहर प्रधानमन्त्री के निकटस्थ व्यक्तियो ने आचार्यप्रवर का स्वागत किया।  वहॉ के सैक्रेटरी मदलालजी आचार्य श्री को
कोठी मे ले गए। कोठी मे मदनलालजी ने बैठने के लिए कमरा दिखाया, कालीन बिछा था और कुर्सीयॉ लगी हुई थी।
आचार्य श्री ने कहा-" कालीन पर तो हम नही बैठ सकेगे।"
तभी अन्य स्थान बरामदे मे बैठने के लिए उपयुक्त स्थान देख ही रहे थे की प्रधानमत्री जी आ गए। भारतीय सस्कृति के अनुसार दोनो हाथ जोडकर प्रधानमन्त्री ने आचार्यश्री को वन्दन किया।
क्रमश पढे (अगले अक मे)...........

आचार्य श्री तुलसी एवम प्रधानमत्री के बीच ? 41 मिनट तक क्या सवाद हुआ ?  
इस मुलाकात ने नेहरु जी को ऐसा क्यो महसुस हुआ की देश के नैतिक विकास मे आचार्य श्री का अणूव्रत आन्दोलन कारगर साबित होगा ? 
यह मुलाकातो का सिलसिला एक बार चला तो अन्त तक रुका नही ?
इस तरह के अनेक सवाल आपके मन मे उठ रहे होगे तो समाधान के लिए अगले अक की प्रतिक्षा करे।
डॉ,राजेन्द्रप्रसाद आचार्य तुलसी सवाद और नेहरुजी
1951
आचार्य तुलसी सवाद शिखरपुरुषो के साथ-२
सम्पादिका- साध्वी प्रमुखा कनक प्रभा
पेज क्रमाक 42 से44


 नैतिक क्रांति, मानसिक शांति और व्यक्तित्व निर्माण की पृष्ठभूमि पर आचार्य श्री ने तीन अभियान चलाए - अणुव्रत आन्दोलन, प्रेक्षाध्यान और जीवन विज्ञान। ये तीनों ही अभियान अनुपम हैं, अपूर्व है और अपेक्षित हैं। अणुव्रत जाति, लिंग, रंग सम्प्रदाय आदि के भेदों से ऊपर उठकर मानव मात्र को चारित्रिक मूल्यों के संकट से उबारने का उपक्रम है। प्रेक्षाध्यान मानसिक एवं शारीरिक तनावों से ग्रसित मानवीय चेतना को शक्ति के पथ पर अग्रसर कर रहा है। जीवन विज्ञान के प्रयोग व्यक्तित्व के सर्वागीण विकास की प्रक्रिया है एवं शैक्षिक जगत की समस्याओं का समीचीन समाधान है।
युगप्रधान आचार्य श्री तुलसी

प्रधानमन्त्री नेहरू-" यह आशुकविता क्या होती है ?


गताक से आगे........
                                           आचार्य तुलसी

प्रधानमन्त्री-" आचार्यजी! आप यहॉ बैठने की कृपा करे ? स्थान उपयुक्त था पर वहॉ कुछ चीटियॉ थी। उन्हे देखकर आचर्यश्री ने कहा-" यहॉ तो चीटियॉ है। आचार्य श्री अपनी बात पुरी करे उससे पहले ही प्रधानमत्री बोल उठे- आचार्यजी आप यहॉ बैठ नही पायेगे दूसरा स्थान देख लेते है।"
प्रधानमन्त्री ने एक कुर्सी की गद्दी अपने हाथ मे ले ली और आचार्यश्री के साथ साथ चले। बरामदे के दुसरे छोर पर साफ सुथरा स्थान था।
वहॉ साधुओ ने छोटा काष्टपट बिछा दिया, उस पर आचार्यश्री बैठ गये और उनके पास साधू बैठ गऐ। प्रधानमन्त्री ने अपने हाथ से गद्दी बिछाई और आचार्यश्री तुलसी के सामने बैठ गये। उनकी इस सहजता और विनम्रता का दर्शको के मन पर गहरा प्रभाव पडा। प्रधानमन्त्री ने गृहमन्त्री कैलाशानाथ काटजू, यूपी के मुख्यमन्त्री गोविन्दवल्ल्भ पन्त और अपनी पुत्री प्रियदर्शिनी ईन्दरा गान्धी को वही बुला लिया। पन्तजी वृद्ध थे, उन्हे निचे बैठने मे असुविधा हो रही थी। प्रधानमन्त्री उनकी ओ‍र उन्मुख होकर बोले-"पन्तजी! आपको निचे बैठने मे कष्ट होगा, आप कुर्सी पर बैठ जाइये।"पन्तजी ने कहा-"नही मे नीचे ही बैठुगा।"
(देश के प्रधानमन्त्री से मिलने का आचार्य श्री तुलसी का यह पहला अवसर था। प्रधानमन्त्री भी किसी धर्म सघ के आचार्य से पहली बार मिल रहे है। दोनो और उत्सुकता थी। पर बात शुरु करने की समस्या थी। दो क्षण सभी मोन रहे। आखिर प्रधानमन्त्री ने मोन को तोडा)
प्रधानमन्त्री-" अच्छा, आचार्याजी! बोलिये आप क्या चाहते है ?"
आचार्यश्री-"हम कुछ नही चाहते।"
( बात प्रारम्भ होने से पहले ही समाप्त हो गई। वहॉ बैठे सभी लोग आचार्यश्री की और देखने लगे। स्वय प्रधानमन्त्री को इस प्रकार के उत्तर की आशा नही थी। बातचीत का सूत्र पुनः उनकी और से जोडा गया)

प्रधानमन्त्री-" फिर आपका यहॉ आने का उद्देशय क्या है ?"
आचार्यश्री-" हमारा आपके साथ कोई परिचय नही है। राष्ट्रपति राजेन्द्रवाबू को हम जानते है। हम उनसे मिले थे। उन्होने हमे प्रेरणा दी कि आपसे अवश्य मिले। वैसे गत वर्ष गर्मी के दिनो मे यहॉ आए थे। उस समय आपसे मिलने का प्रसग ही नही बना। आपको शायद ज्ञात नही होगा की हम कुछ वर्षो से एक नैतिक अभियान चला रहे है। आप यह भी जानते है की देश आजाद हुआ तब उसमे देश वासियो को बहुत बलिदान नही करना पडा। ऐसी स्थिति मे नैतिक गिरावट की सम्भावना प्रबल हो उठी है। हमने सोचा- हमारे पास- पॉच सो पदयात्री साधू-साध्विया कि फोज है। आप देश के नैतिक उत्थान मे इस फोज का उपयोग करना चाहे तो वो तैयार। यह बात बताने के लिए हम यहॉ आए है।"

प्रधानमन्त्री-" यह तो बहूत काम की बात है। आपने अब तक अपनी बात हम तक पहुचाई क्यो नही ?"
आचार्यश्री-" पण्डितजी! आपके बारे मे सुना था की आपकी धर्म के विषय मे रुची नही है। आप जानते है हम धर्म के आदमी है। इस कारण हमने कभी आपसे मिलने का प्रयास ही नही किया। इधर मे हमने आपके कुछ वक्तव्य पढे। उनमे यत्र-तत्र अध्यात्म की चर्चा है। उससे लगा आपकी अरुची धर्म से नही सम्प्रदायो से है। साम्प्रदायिक क्रियाकान्डो मे आपका रुझान नही है, पर अध्यात्म को देश समाज के लिऍ उपयोगी मानते है।
अणुव्रत यही कहता है कि व्यक्ती-व्यक्ती चरित्र निष्ठ बने। उनकी चरित्रनिष्ठा का प्रभाव समाज और राष्ट्र पर हो तो देश के गिरते हुए नैतिक स्तर को ऊचॉ उठाया जा सकता है। इस उदेश्य के लिए हम अणुव्रत का कार्य कर रहे है। अणुव्रत का पहला अधिवेशन दिल्ली मे और दुसरा पन्जाब मे हुआ। अब तक हजारो व्यक्ती अणुव्रती बन चुके है।
प्रधानमन्त्री-" अणुव्रती कहॉ बने है ? हमारे देश मे बने है क्या ?"
आचार्यश्री-" हम पदयात्री है, इसलिए देश मे ही पद यात्रा करते हुऍ काम कर रहे है। अणुव्रती बनने वाले इसी देश के है। आपने अणुव्रत की आचार सहिता देखी नही होगी।

प्रधानमन्त्री-" नही, अब तक नही देखी है। मेरी इच्छा है मै उसे देखूगा।"
आचार्य श्री-" उसके बारे मे आपके मुलयवान सुझाव भी अपेक्षित रहेगा।

हम अणुव्रत कार्यक्रम को व्यापक रुप मे आगे बढाना के लिए प्रयत्नशिल है। दिल्ली चातुर्मास प्रवास मे अणुव्रत के बारे मे साप्ताहीक विचार परिषदे आयोजित हुई। उसमे आपके मन्त्रीमण्डल के अनेक सदय उपस्थित हुए थे। गुलजारीलाल नन्दा, शकरराव चव्हाण आदि ने अणुव्रत के बारे मे अच्छे विचार रखे।

       Jawaharlal Nehru    First Prime Minister of India.
A Movement Strong Foundation
      If we wish to build the edifice of our nation, its foundation must be laid on sand, the whole structure will collapse the moment it gives way. The edifice erected on the foundation of character is always strong. We have the responsibility of implementing many important projects in our country. They are all embedded in character. The Anuvrat Movement is doing good work in this direction. I believe that the more this work progresses the better it is . So I wish the Anuvrat Movement all success.

इसके पुर्व चर्चा पर नजर डाले 

डॉ,राजेन्द्रप्रसाद आचार्य तुलसी सवाद और नेहरुजी-3
1951
आचार्य तुलसी सवाद शिखरपुरुषो के साथ-3
सम्पादिका- साध्वी प्रमुखा कनक प्रभा
पेज क्रमाक 44 से 46
क्रमश.......


प्रधानमन्त्री नेहरू-" यह आशुकविता क्या होती है ?
प्रधानमन्त्री-"पन्तजी! आशु कविता का विषय आप दिजिए।
और ऐसे बहुत से प्रशन जो नेहरु जी के बारे मे हम बात करेगे अगले अक मे।
आचार्य श्री तुलसी ने एक छत्र ५२ वर्षो तक तेरापन्थ धर्म सघ के अधिशास्ता के रुप मे आचार्यपद का निर्वाह किया। वो गीतिका भी बहूत गाते थे॥उनकी ही अवाज मे आप भी यह गीतिका सुने। 
 
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