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Feb 1, 2013

मर्यादा महोत्सव की श्रृंखला




आचार्य श्री जीतमलजी

वि.सं.१९२१-बालोतरा
वि.सं.१९२२-कंटालिया
वि.सं.१९२३-बीदासर
वि.सं.१९२४-सुजानगढ
वि.सं.१९२५-लाडनूं
वि.सं.१९२६-बीदासर



वि.सं.१९२७-बीदासर
वि.सं.१९२८-जयपुर
वि.सं.१९२९-बीदासर
वि.सं.१९३०-बीदासर
वि.सं.१९३१-बीदासर
वि.सं.१९३२-बीदासर




वि.सं.१९३३-बीदासर
वि.सं.१९३४-लाडनूं
वि.सं.१९३५-बीदासर
वि.सं.१९३६-लाडनूं
वि.सं.१९३७-जयपुर




आचार्य श्री मघवागणी
वि.सं.१९३८-जयपुर
वि.सं.१९३९-चुरू
वि.सं.१९४०-लाडनूं
वि.सं.१९४१-लाडनूं
वि.सं.१९४२-जोजावर
वि.सं.१९४३-दौलतग‹ढ
वि.सं.१९४४-बीकानेर
वि.सं.१९४५-रतनग‹ढ
वि.सं.१९४६-लाडनूं
वि.सं.१९४७-जयपुर
वि.सं.१९४८-
वि.सं.१९४९-



आचार्य श्री माणकगणी
वि.सं.१९५०-हांसी
वि.सं.१९५१-बीदासर
वि.सं.१९५२-लाडनूं
वि.सं.१९५३-बीदासर
आचार्य श्री डालगणी
वि.सं.१९५४-बीदासर
वि.सं.१९५५-बीदासर
वि.सं.१९५६-राजलदेसर
वि.सं.१९५७-लाडनूं
वि.सं.१९५८-लाडनूं
वि.सं.१९५९-उदयपुर
वि.सं.१९६०-बीदासर
वि.सं.१९६१-रतनगढ
वि.सं.१९६२-बीदासर
वि.सं.१९६३-सरदारशहर
वि.सं.१९६४-लाडनूं
वि.सं.१९६५-लाडनूं



आचार्य श्री कालूगणी
वि.सं.१९६६-बीदासर
वि.सं.१९६७-राजलदेसर
वि.सं.१९६८-लाडनूं
वि.सं.१९६९-बीदासर
वि.सं.१९७०-बीदासर
वि.सं.१९७१-गंगापुर
वि.सं.१९७२-पाली
वि.सं.१९७३-लाडनूं
वि.सं.१९७४-राजदेसर
वि.सं.१९७५-सुजानगढ
वि.सं.१९७६-सरदारशहर
वि.सं.१९७७-सरदारशहर
वि.सं.१९७८-लाडनूं
वि.सं.१९७९-राजलदेसर
वि.सं.१९८०-सुजानगढ
वि.सं.१९८१-सरदारशहर
वि.सं.१९८२-राजलदेसर
वि.सं.१९८३-लाडनूं
वि.सं.१९८४-चुरू
वि.सं.१९८५-लाडनूं
वि.सं.१९८६-सुजानगढ
वि.सं.१९८७-सरदारशहर
वि.सं.१९८८-छापर
वि.सं.१९८९-श्री डूंगरगढ
वि.सं.१९९०-लाडनूं
वि.सं.१९९१-बगडी
वि.सं.१९९२-बडनगर




आचार्य श्री तुलसी

वि.सं.१९९३-ब्यावर
वि.सं.१९९४-गंगाशहर
वि.सं.१९९५-रतनगढ
वि.सं.१९९६-सरदारशहर
वि.सं.१९९७-लाडनूं
वि.सं.१९९८-सरदारशहर
वि.सं.१९९९-श्री डूंगरगढ
वि.सं.२०००-गंगाशहर
वि.सं.२००१-सुजानगढ
वि.सं.२००२-सरदारशहर
वि.सं.२००३-चुरू
वि.सं.२००४-बीदासर
वि.सं.२००५-राजलदेसर
वि.सं.२००६-जयपुर
वि.सं.२००७-भिवानी
वि.सं.२००८-सरदारशहर
वि.सं.२००९-सरदारशहर
वि.सं.२०१०-राणावास
वि.सं.२०११-मुम्बई
वि.सं.२०१२-भीलवाडा
वि.सं.२०१३-सरदारशहर
वि.सं.२०१४-लाडनूं
वि.सं.२०१५-सैन्थिया
वि.सं.२०१६-हांसी
वि.सं.२०१७-आमेट
वि.सं.२०१८-भीनासर
वि.सं.२०१९-राजनगर
वि.सं.२०२०-लाडनूं
वि.सं.२०२१-बालोतरा
वि.सं.२०२२-हिसार
वि.सं.२०२३-बीदासर
वि.सं.२०२४-मुम्बई
वि.सं.२०२५-चिदम्बरम
वि.सं.२०२६-हैदराबाद
वि.सं.२०२७-बीदासर
वि.सं.२०२८-गंगाशहर
वि.सं.२०२९-मोमासर
वि.सं.२०३०-दिल्ली
वि.सं.२०३१-श्री डूंगरगढ
वि.सं.२०३२-लाडनूं
वि.सं.२०३३-पडिहारा
वि.सं.२०३४-सुजानगढ
वि.सं.२०३५-राजदेसर
वि.सं.२०३६-संगरूर
वि.सं.२०३७-सरदारशहर
वि.सं.२०३८-गंगाशहर
वि.सं.२०३९-नाथद्वारा
वि.सं.२०४०-बीदासर
वि.सं.२०४१-जसोल
वि.सं.२०४२-उदयपुर
वि.सं.२०४३-रतनगढ
वि.सं.२०४४-नई दिल्ली
वि.सं.२०४५-छापर
वि.सं.२०४६-लाडनूं
वि.सं.२०४७-बगडी
वि.सं.२०४८-लाडनूं
वि.सं.२०४९-बीदासर
वि.सं.२०५०-सुजानगढ
वि.सं.२०५१-नई दिल्ली



आचार्य श्री महाप्रज्ञ
वि.सं.२०५२-लाडनूं
वि.सं.२०५३-चाडवास
वि.सं.२०५४-नोखामंडी
वि.सं.२०५५-टोहाना
वि.सं.२०५६-तारानगर
वि.सं.२०५७-गंगाशहर
वि.सं.२०५८-पचपदरा
वि.सं.२०५९-मुम्बई
वि.सं.२०६०-जलगांव
वि.सं.२०६१-लाडनूं
वि.सं.२०६२-धुरी
वि.सं.२०६३-गंगाशहर
वि.सं.२०६४-आसीन्द
वि.सं.२०६५-बीदासर
वि.सं.२०६६-डूंगरगढ

आचार्य श्री महाश्रमण
वि.सं.२०६७-राजलदेसर
वि.सं.२०६८-आमेट
वि.सं.२०६९-टापरा





मर्यादापत्र : नवीन संस्करण तेरापंथ की मौलिक मर्यादाय




1.सर्व साधु-साध्वियां एक आचार्य की आज्ञा में रहें।

2.विहार-चातुर्मास आचार्य की आज्ञा से करें।

3.अपने शिष्य न बनाए।

4.आचार्य योग्य व्यक्ति को ही दीक्षित करे। दीक्षित करने पर कोई अयोग्य निकले तो उसे गण से अलग कर दें।

5.आचार्य अपने गुरु भाई या शिष्य को उत्तराधिकारी चुने तो सब साधु-साध्वियां सहर्ष स्वीकार करें।

6.श्रद्धा या आचार के बोल को लेकर गण में भेद न डालें। दलबन्छी न करें। आचार्य व बहुश्रुत साधु कहे वह मान लें अथवा केवली गम्य कर दें।

7.गण में शुद्ध साधुपन सरधे वह गण में रहे किन्तु छल-कपट पूर्वक गण में न रहे। जिसका मन साक्षी दे, भली-भांति साधुपन पलता जाने, गण में तथा अपने आप में साधुपन माने तो गण में रहे किन्तु वंचना-पूर्वक गण में न रहे।

8.गण में किसी साधु-साध्वी के प्रति अनास्था उपजे, शंका उपजे वैसी बात न करें।

9.किसी साधु-साध्वी में दोष जान पडे तो तत्काल उसे या आचार्य को जता दें, किन्तु उसका प्रचार न करें, दोषों को चुन-चुन कर इकट्ठा न करें।

10 किसी साधु-साध्वी को जाति आदि को लेकर ओछी जुबान न बोलें।

11 गण के पुस्तक पन्नें आदि पर अपना अधिकार न करें।

12 गण से बहिष्कृत या बहिर्भूत व्यक्ति से संस्तव न करें।

13 पद के लिए उम्मीदवार न बनें।

सदा दिवाली संत के आठों प्रहर आनन्द




सदा दिवाली संत के आठों प्रहर आनन्द, यह एक अति प्रचलित पुरानी कहावत है, जिसका भावार्थ है-साधु जन के तो सदैव पर्व और आनन्द होता है, वे इन बाह्य पर्वों या आनन्दों को क्या मनाये? परन्तु यह कहावत-गृहस्थों द्वारा मनाये जाने वाले पर्वों से साधु को अलग रहा चाहिये, क्योंकि वे भौतिक सुख-सामग्री और शारीरिक आनन्दोल्लास के ही प्राय: द्योतक होते हैं-इस भावना को प्रकट करने के लिये है। आध्यात्मिक पर्व तो लक्ष्य को और भी नजदीक लाने में सहायक होते हैं-गति को बल देना अध्यात्म में भी आवश्यक होता है और वह बल पर्व देते हैं इसमें तनिक भी सन्देह नहीं।


पर्यूषण, सम्वत्सरी आदि जैनों के ऐसे ही पर्व हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक रख कर क्षमाशील और अद्वेषी बनाने की प्रेरणा देते हैं। अध्यात्म-पर्व, आत्म-जागरण, स्तवन, ध्यान, चिन्तन तथा तपश्चर्या आदि के द्वारा ही मनाये जाते हैं। तेरापंथ में उपर्युक्त पर्यूषण आदि पर्व तो मनाये ही जाते हैं पर इनके सिवाय और भी तीन पर्व मनाये जाते हैं-जिन्हें महोत्सव कहते हैं। ये तीनो महोत्सव अपना अलग-अलग महत्त्व रखते हैं। तेरापंथ की प्रगति और संगठन में इन महोत्सवों का भी बहुत बडा सम्माननीय स्थान रहा है। इन तीनों को क्रमश: पट्टोत्सव, चरमोत्सव और मर्यादा महोत्सव कहा जाता है। तेरापंथ के चतुर्थ आचार्य श्री जयाचार्य में शासन-हित की दृष्टि से इनका सूत्रपात किया था। पट्टोत्सव का प्रारम्भ सम्वत् १९११ में, चरमोत्सव का सम्वत् १९१४ में और मर्यादा महोत्सव का सम्वत् १९२१ में हुआ था। तब से आज तक उत्तरोत्तर ब‹ढते हुए हर्ष के साथ प्रतिवर्ष ये महोत्सव मनाये जाते रहे हैं।



मर्यादा महोत्सव माघ शुक्ला सप्तमी के दिन मनाया जाता है। इसे माघ महोत्सव भी कहते हैं। यह दिन तेरापंथ के विधान की पूर्णता का दिन है। इस अवसर पर तेरापंथ का प्राय: समूचा साधु-संघ आचार्य श्री द्वारा पूर्व निर्दिष्ट किसी एक क्षेत्र में एकत्रित होता है। विगत वर्ष में किया गया कार्य आचार्य देव से निवेदित किया जाता है और आगामी वर्ष के लिये एक कार्यक्रम निर्धारित किया जाता है। साधु-साध्वियों के विहार तथा चातुर्मास के क्षेत्र भी आचार्य देव द्वारा प्राय: इसी समय निर्णीत किये जाते हैं। साधुओं में परस्पर विचार गोष्ठियां होती रहती हैं, जिनमें संघ की आन्तरिक व बाह्य स्थितियों पर तथा सैद्धान्तिक, दार्शनिक या साहित्यिक विषयों पर विचार-विनिमय किया जाता है। सारांष यह है कि माघ-महोत्सव तेरापंथ की प्रवृत्ति का केन्द्र बना हुआ है।

चातुर्मास समाप्ति से लेकर माघ शुक्ला ७ तक के दिन तेरापंथ संघ के लिये बहुत ही उपयोग के हो जाते हैं। आचार्य देव की शिक्षाओ विचार गोष्ठियों तथा प्रतियोगिताओं आदि द्वारा ये दिन इतने व्यस्त कार्यक्रम के होते हैं कि समय की कमी अखरे बिना नहीं रहती।

सप्तमी के दिन आचार्य श्री द्वारा मर्यादाओं का वाचन होता है। और तेरापंथ संघ को उन मर्यादाओं में अडिग रूप से चलने की प्रेरणा दी जाती है। स्वयं स्वामीजी के हाथ से लिखा हुआ मर्यादा पत्र जिसके आधार पर यह महोत्सव मनाया जाता है सबको दिखलाया जाता है। इस अवसर पर साधु-साध्वियों के भाषण, कविताएँ आदि भी होती हैं।


तेरापंथ संघ अपने शासन के विधान को बहुत ही पवित्र दृष्टि से देखता है। क्योंकि वह जानता है कि एक आचार, एक विचार और एक आचार्य की लाभदायक पद्धति को स्थिर बनाये रखने के लिये विधान के प्रति श्रद्धालु होना अत्यन्त आवश्यक है। विधान की वफादारी ही संघ-ऐक्य की प्रथम शर्त हुआ करती है। अत: प्रत्येक साधु साध्वी को विधान में लिखित मर्यादाओं का प्रतिज्ञाबद्ध होकर पालन करना होता है। कोई भी व्यक्ति इसमें अपने लिये अपवाद प्राप्त नहीं कर सकता। महोत्सव के दिनों में नई मर्यादाओं के निर्माण तथा पूर्व मर्यादाओं में परिवर्तन सम्बन्धी समयानुकूल अनेक सुझाव भी आचार्य श्री के सम्मुख प्रस्तुत किये जाते हैं। उनमें से उपयोगी सुझावों पर आवश्यकतानुसार विचार-विमर्श के बाद आचार्य श्री स्वीकृति प्रदान करते हैं और समस्त साधु-साध्वी संघ में तद्विषयक लिखित घोषणा करते हैं। तब वह मर्यादा के रूप में विधान का एक अपरिहार्य अंग बन जाती है। कुछ प्राचीन परम्परायें अलिखित होते हुए भी मर्यादा के समक्ष मानी जाती हैं और उनका पालन भी विधान के समान ही अपरिहार्य होता है।


माघ शुक्ला सप्तमी के दिन ही एक हाजरी का आयोजन भी होता है। जिसमें साधु और साध्वियां पर्यायक्रम से ख‹डे होकर लेख पत्र में लिखित मर्यादाओं की शपथ लेते हैं।

महोत्सव सम्पन्न होने के बाद शीघ्र ही साधु-साध्वियों के विहार प्रारम्भ हो जाते हैं और वे प्राय: अपने-अपने गन्तव्य स्थानों की ओर आगामी महोत्सव में सम्मिलित होने की गांठ बांधकर चल प‹डते हैं।

मर्यादा पत्र मूल प्रति

वक्रम सम्वत् १८६२ मार्गशीर्ष कृष्णा ७ को आचार्य श्री भिक्षु ने मुनि भारमलजी को इस लिखित पत्र के द्वारा युवाचार्य पद प्रदान किया। वर्तमान में यही पत्र मर्यादा पत्र के नाम से जाना जाता है।

ऋष भीखन सर्व साधां नें पूछनें सर्व साध साधवीयां री मरजादा बांधी ते साधां ने पूछनें, साधां कना थी कहवाय नैं, लिखिए छै।

सर्व साध साध्वी भारमलजी री आज्ञा मांहै चालणो। 
विहार चोमासो करणो ते भारमलजी री आज्ञा सूं करणो। 
दीख्या देणी ते भारमलजी रे नाम दीख्या देणी।

चेला री, कपडा री, साताकारीया खेतर री आदि देई नें ममता कर कर ने अनंता जीव चारित गमाय नैं नरक निगोद माहैं गया छै तिण सूं सिषादिक री ममता मिटावण रो नैं चारित चोखो पालणरो उपाय कीधो छै।

विनै मूल धर्म नें न्याय मारग चालण रो उपाय कीधो छै।

भेषधारी विकलां नें मूंड भेला करै ते सिषां रा भूखा एक एक रा अवर्णवाद वाले। फारा-तोरो करै, कजीया राड करै। एहवा चरित देख नें साधां रे मरजादा बांधी।

सिष सिष्यां रो संतोष कराय नें सुखे संजय वालण रो उपाय कीधो।

साधां पिण इमहिज कह्यो। भारमलजी री आज्ञा माये चालणो।

सिष करणा ते सर्व भारमलजी रे करणा। भारमलजी घणा रजाबंध होय नें और साध नें चेलो सूंपे तो करणा। बीजूं करण रो अटकाव कीधो छै। भारमलजी पिण आपरे चेलो करै ते पिण तिलोकचन्दजी चंदरभाणजी आदि बुधवान साध कहै ओ साधपणा लायक छै बीजा साधां नें परतीत आवैं तेहवो करणो। परतीत नहीं आवैं तो नहीं करणो। कीधां पछै कोई अजोग हुवै तो पिण तिलोकचन्दजी चंदरभाणजी आदि बुधवान साधां रा कह्यां सूं छोड देणा पिण मांहै राखणो नहीं।

  नवपदार्थ ओलखाय नें दिख्या देणी। 
आचार पालां छां तिण रीते चोखो पालणो। 
ऐहवी रीत परम्परा बांधी छै।

 भारमलजी री इच्छा आवै जद गुरभाइ चेलादिक नें टोलारो भार सूंपै ते पिण कबूल छै। ते पिण रीत परंपरा छै। सर्व साध वाधवीयां एकण री आज्ञा मांहें चालणो एहवी रीत बांधी छै। कोई टोला मां सूं फारा तोरो करनैं, एक दोय आदि नीकलै घणी धुरताइ करै, बुगल ध्यानी हुवै, त्यांने साध सरधणा नहीं। च्यार तीर्थ मांहै गिणवा नहीं। यांनें चतुविध संघ रा qनदक जाणवा। एहवा नै वांदै पूजै तके पिण आज्ञा बारै छै। चरचा बोल किण नें छोडणो मेलणो तिलोकचंदजी चंदरभाणजी आदि बुधवान नै पूछनें करणो। सरधा रो बोल पिण इत्यादिक तिमहीज जाणवो। वले कोई याद आवे ते पिण लिखणो। ते पिण सर्व कबूल कर लेणो। ए सर्व साधां रा परमाण जोय नें, रजाबंध करने, यां कनासूं पिण जुदो जुदो कहवाउ नै मरजादा बांधी छै। जिण रा परिणाम मांहिला चोखा हुवै ते मतो घालणो। कोइ सरमा सरमी रो काम छै नहीं। मूंढै और नें मन में ओर इम तो साधु ने करवो छै नहीं। इण लिखत में खूंचणो काढणो नहीं। पछै कोइ ओर रो ओर बोलणो नहीं। अनंता सिधां रा साख सूं पचखाण छै। सं.

१८३२ मिगसर बिद ७ लिखतू ऋष भीखन रो छै। साख १ थिरपाल री छै।

लिखतु वीरभाणजी उपर लिखीयो सही। 
लिखतु हरनाथ ऊपर लिखियो ते सही। 
लिखतु ऋष सुखराम ऊपर लिखियो ते सही। 
लिखतु ऋष तिलोकचंद ऊपर लिखियो ते सही। 
लिखतु ऋष चंदरभाण ऊपर लिखियो ते सही। 
लिखतु ऋष अखैराम ऊपर लिखियो ते सही। 
लिखतु ऋष अणदा ऊपर लिखियो ते सही।

Apr 26, 2011

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जैन तेरापंथ समाचार में आपका स्वागत है ....
 
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